वर्षा बहार

                 वर्षा बहार 

           

वर्षा बहार सबके, मन को लुभा रही है
नभ  में छठा अंगूठी, घनघोर छा रही है।

बिजली चमक रही है, बादल गरज रहे हैं
पानी बरस रहा है, झरने भी वह रहे हैं।

चलती हवा है ठंडी, हिलती है डालिया सब
बागों में गीत सुंदर, गाती है मालीने अब।

तालों में जीव जलचर, आती है प्रसन्न होते,
फिरते लाखों पपीहे, हैं ग्रीष्म ताप खोते।

करते हैं नृत्य वन में, देखो ए मोर सारे,
मेंढक लुभा रहे हैं, गाकर सुगित प्यारे।

खिलता गुलाब कैसा, सौरभ उड़ा रहा है,
बागों में खूब सुख से, आमोद अच्छा रहा है।

चलते कतार बांधे, देखो ये हंस सुंदर,
गाते हैं गीत कैसे, लेते किसान मनहर।

इस भांति है अनोखी, वर्षा बहार भू पर,
सारे जगत की शोभा, निर्भर है इसके ऊपर।

                 'धन्यवाद'

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