मैं फिर ऊगूंगा किसी दिन

मैं फिर ऊगूंगा किसी दिन


मैं फिर ऊगूंगा किसी दिन



मैं फिर ऊगूंगा किसी दिन 
मैं डूबा नहीं हूं अभी,
बस नाप रहा हूं, सागर के अनंत गहराइयों को 
अस्त भी नहीं हुआ हूं अभी,
बस समय की कुछ पतनिया घेरे हुए हैं मेरे क्षितिज को,
मैं फिर ऊगूंगा किसी दिन

जैसे उगती है घास बिन बोये बंजर जमीनों से,
मैं फिर से जोड़ लूंगा कुछ टूटे सपनों को
खिलौनों की तरह
फिर खिल खिलाऊंगा बच्चों की तरह,
तोडूंगा कुछ गलतफहमियां को किसी के जेहन से
जैसे टूटते हैं भाप कच्चे नींदों में और रूबरू कराते हैं वास्तविक रोशनीओ  से
मैं फिर ऊगंगा किसी दिन,

मैं फिर ऊगूंगा किसी दिन


मैं फिर से मुकृत हूंगा किसी दिन
जैसी बरसात की रातों में कुछ अनजानी सी आवाजे  भीगती रहती है सनाटो को रात भर,
मैं फिर ऊगूंगा किसी दिन सूरज की तरह
पूरब नहीं किसी भी दिशा से
और समेट दूंगा सभी अंधेरों को
अब अपनी अविचलित अपराजित रोशनियों से 
मैं फिर ऊगूंगा किसी दिन,

🙏 धन्यवाद 🙏

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